गुरु पूर्णिमा पर विशेष
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया
चक्षुरुन्मिलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
जिसने अपने ज्ञान
रुपी काजल से हमारे भीतर छिपा अंधकार दूर करके हमारी आँखे खोल दी है ऐसे गुरु को
मैं प्रणाम करता हूँ। यहाँ पर उपस्थित
प्रधानाचार्या जी, उपप्रधानाचार्य
जी तथा मेरे सहयोगी अध्यापक एवं अध्यापिका तथा सभी छात्रों और छात्राओं को इस गुरु
पूर्णिमा के पावन बेला पर आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ। जैसा कि आप सभी जानते है आज का दिन गुरु
पूर्णिमा के उपलक्ष्य के रुप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर विश्व
के समस्त गुरुजनों को मेरा शत शत नमन। कबीर दास तो गुरु को भगवान से भी बड़ा दर्जा
देते हुए कहते हैं कि -
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाँव
बलिहारी गुरु आपनो,
गोविंद दियो बताय।।
अर्थात कबीर दास
जी कहते हैं कि अगर मेरे सामने एक तरफ भगवान खडे़ हो तथा दूसरी तरफ गुरु खड़े हो
तो मैं गुरु के पाँव छूना ही पसंद करुँगा क्योंकि गुरु ही हैं जो भगवान का पाने का
रास्ता बताते हैं । गुरु ही हमें अज्ञान रुपी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं।
माता-पिता के बाद गुरु ही शिष्य को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाते है। मानव मन में
व्याप्त बुराइयों को दूर करने में गुरु का ही विशेष योगदान होता है। नारद जी से
प्रेरणा प्राप्त कर रत्नाकर वाल्मिकी कहलाए और रामायण की रचना की। कबीर दास जी गुरु की गुणों की महिमा का बखान
करते हुए कहते हैं कि
सब धरती कागज करुँ, लेखनी सब वनराज,
सात समुंद्र की मसि करुँ, गुरु गुण लिखा ना जाए।।
अर्थात - कबीर
दास जी कहते है कि अगर मैं पूरी धरती को कागज बना दूँ और इस धरती पर खड़े सभी
पेड़ों को कलम बना दूँ तथा सातों समुंद्र के पानी को स्याही बना दूँ तो भी मैं
गुरु के गुणों का बखान नहीं कर सकता। गुरु की महिमा का बखान करना सूर्य को दीपक
दिखाने के समान है। आज मैं इस मंच पर खड़ा होकर उन सभी गुरुओं, शिक्षकों तथा
अध्यापकों का नमन/अभिवादन करता हूँ जो इस पवित्र कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं
और आने वाली पीढ़ी को अपने पवित्र ज्ञान के माध्यम से उन्हें नया जीवन दान देते
हैं। मुझे आचार्य चाणक्य जी की एक बात याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था कि – प्रलय और निर्माण आचार्य की गोद में पलते है।
इतिहास में ऐसे
अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं जिसमें छात्रों एवं छात्राओं ने अपने गुरु से ज्ञान
प्राप्त कर महान बनने की प्रेरणा ली । जैसे आचार्य चाणक्य से शिक्षा प्राप्त कर
चंद्रगुप्त मौर्य मगध राज्य का राजा बना। नरेंद्र नाम का बालक अपने गुरु स्वामी
रामकृश्ण से शिक्षा प्राप्त कर स्वामी विवेकानंद के नाम से विख्यात हुए। ऐसे
अनेकों उदाहरण हमारे साहित्यों में हैं जिन्होंने अपने गुरुओं में श्रद्धा रखी और
जगत में अपना नाम कर गए।
अंत में कबीर दास
जी की दो पंक्तियाँ प्रस्तुत कर अपनी वाणी को विराम दूँगा-
यह तन विष की वेलरी, गुरु अमृत की खान
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
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