‘‘वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन न रवानी हो,
जो परवश होकर जीता है
वह खून नहीं है पानी है।’’
जी हाँ, जो परवष होकर जीता है वह खून नहीं है पानी हैं।
हमारा देष सैंकड़ों वर्शों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। जिसे अपनी खून की
नदियाँ बहाकर हमारे देषभक्तों ने गुलामी की दासतां से मुक्त करवाया और उनकी इस
षहादत को याद करने के लिए हम सब यहाँ एकत्रित हुएँ हैं।
सुप्रभात, नमस्कार सम्माननीया प्रधानाचार्या जी, शिक्षकगण एवं मेरे सहपाठियों ।
यह मेरा सौभाग्य है कि
मुझे आज आजादी के इस पावन पर्व पर बोलने का अवसर प्राप्त हुआ है।
जैसा कि आप सब को विदित
है कि 15 अगस्त 1947 को हमारा देष में एक आजादी का स्वर्णिम इतिहास
रचा गया था और उस दिन हमारे देषवासियों ने अंग्रेजों को देष छोड़ने पर मजबूर कर
दिया था - उनके लिए दो पंक्तियाँ समर्पित करती हूँ
‘‘चढ़ गए जो हँसकर सूली,
खाई जिन्होंने सीने पर गोली, हम उनको प्रणाम करते हैं,
जो मिट गए देष की आन बान
और षान पर, हम उन वीरों को सलाम करते
हैंे।’’
आज हमारा देष उसी आजादी
की 69(उनहत्तर)वीं वर्शगाँठ मना
रहा है मैं यह बात आपको बताना चाहती हूँ कि हमें यह आजादी उपहार में नहीं मिली है ?
ये आजादी अमूल्य है क्योंकि इस आजादी को
प्राप्त करने में हमारे असंख्य, अगणित
भाई-बन्धुओं का संघर्श ,त्याग तथा बलिदान
का प्रतीक है। लेकिन आजादी के महत्त्व को जानने के लिए हमारा यह जानना बेहद जरुरी
हो जाता है कि क्या है आजादी? मैं आप सभी से
पूछती हूँ कि क्या है आजादी ?
वैसे तो आजादी को
परिभाशित करना बेहद कठिन है।
आजादी का अर्थ है कि
विकास के पथ पर आगे बढ़कर देष और समाज को ऐसी दिषा देना जिससे हमारे देष की
संस्कृति की भीनी-भीनी खुषबू चारों ओर फैल सके।
लेकिन यह बहुत ही
दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देष के लोग ही आजादी का सही अर्थ ही भूलते जा रहे हैं।
उन्हें नहीं पता कि इस देष को आजाद कराने कितने क्रांतिकारियों, देषभक्तों ने अपनी कुर्बानियाँ दी हैं और आज न
जाने कितने ही सिपाही अपने देष की अखण्डता और सुरक्षा कायम रखने के लिए षहीद हो
जाते हैं। ये सब किसलिए ?
मैं आप सब से पूछती हँू
कि ये सब किसलिए ? वो सब ऐसा इसलिए
करते हैं ताकि हम अपने घरों में महफूज़ रह सकें। खुली हवा में चैन और अमन की साँस
ले सके।
जिसे भी देखो वो बस यही
कहता कि मेरे लिए देष ने क्या किया है ? जो मैं करुँ ? मैं उन सभी
मित्रों बन्धुओं से यह कहना चाहती हूँ कि ‘‘यह मत पूछो कि देष ने आपके लिए क्या किया है, बल्कि ये बताओ आपने देष के लिए क्या किया है ?‘‘
ये हमारी नैतिक
जिम्मेदारी बनती है कि मुष्किलों से मिली आजादी का महत्त्व समझें और उन वीरों की
षहादत को याद करें। और एक बात मैं आप सभी के समक्ष रखना चाहती हूँ कि
भले ही आपके टूथपेस्ट में
नमक हो या ना हो ,लेकिन आपके खून
में देष का नमक होना चाहिए।
और अंत में अपनी वाणी को
विराम देते हुए कहना चाहती हूँ कि
‘‘इतनी सी बात हवाओं के
बताए रखना
रोषनी होगी ही चिरागों को
जलाए रखना
लहू देकर जिसकी हिफाजत
हमने की
ऐसे तिरंगे को अपने दिल
में बसाए रखना ’’
एक बार फिर आप सभी को
स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत षुभकामनाएँं
वन्दे मातरम् । भारत माता
की जय ।
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